शूटर दादी बोलीं- यहां औरत को सब पांव की जूती समझते हैं

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागपत जिले के जोहरी गांव, शूटर दादी प्रकाशी और चंद्रो तोमर का नाम गली-गली का बच्चा जानता है। साल 2015 में मोदी सरकार ने एक नारा दिया था, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’… खूब चला ये नारा। लेकिन, नारे के आगे क्या? संसद में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने वाला कानून महिला आरक्षण बिल सालों से पेंडिंग है। बावजूद इसके… सड़क, पानी और बिजली के लिए जूझते देश में महिलाओं ने हर बनी बनाई लकीर तोड़ी है।

शूटर दादी की कहानी इसकी मिसाल है। इसे ऐसे समझिए कि शूटर दादी ने समाज की लड़कियों को जो हौंसला दिया है, वो और के वश का नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव के तहत बागपत में 11 अप्रैल को प्रथम चरण में वोट डाले जाएंगे। बागपत के सामाजिक मिजाज और शूटर दादी के संघर्ष को जानने के लिए जागरण डॉट कॉम ने चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर से बात की और जाना कि आज के राजनीतिक माहौल के बारे में वो क्या सोचती हैं?

अपनी कहानी बताते हुए चंद्रा तोमर कहती हैं कि हमारे क्षेत्र में भी हम पर मूवी बनने लगी है। जो हमने मेहनत की, उसका फल मिल गया। हमें बहुत खुशी हुई। मेरी पोती शेफाली से शुरुआत हुई। वो डर गई थी, मैंने कहा, मैं हूं तेरे साथ। मैंने बंदूक लोड की, सोचा उसके हाथ में दूंगी, फिर सोचा खुद चला के देखूं। मैंने निशाना लगाया तो मेरा लग गया। निशाना ठीक लगा तो सब पूछने लगे, कहने लगे दादी तू अच्छा करेगी। मेरी फैमिली थी, 12 बजे परिवार सो जाता था, तब मैं प्रैक्टिस करती थी। फिर अखबार में छपा। नाम भी, काम भी, फोटो भी। लड़का कहने लगा, गांव में नाम हो गया।

प्रकाशी तोमर बताती हैं कि ‘शादी के बाद मैं जाने लगी, लोगों ने मजाक उड़ाया। यह बुढ़िया करगिल में जाएगी, बंदूक चलाएगी।’ कोच ने कहा, कोई कुछ भी कहे, चुपके-चुपके करते रहो। एक साल बाद मुझे दिल्ली से बुलावा आया।

प्रकाशी आगे बताती हैं, ‘मेरे बराबर में डीआईजी था, वो पुराना शूटर था। लेकिन, मेरा गोल्ड मेडल हो गया। फिर कोई कहने लगा, एक फोटो करा दें। उसने कहा, ‘हटा यार, औरत के सामने बेइज्जती हो गई। उसने कहा कि बेइज्जती औरत ने नहीं, स्कोर ने कराई।’

प्रकाशी कहती हैं, ‘मुझे मेडल मिलने के बाद सभी अपनी औरतों को कहने लगे कि तुम्हें घर में कौन जाने? दादी को दुनिया जानती है। इसलिए लोगों के मुंह बंद हो गए। लड़कों ने पैसा लगाया, सबने सहयोग किया, परिवार ने भी।’

बागपत की राजनीति के बारे में चंद्रो तोमर कहती हैं कि औरत को यहां पांव की जूती समझते हैं। इस पर प्रकाशी कहती हैं कि ‘हमने हिम्मत करके, पिस्टल उठाके उसे अपनी मजबूती बनाई। हमने बेटी भी खिलाई।’

चंद्रो तोमर कहती हैं, ‘हमें ये काम करना था तो करना था, कोई कुछ भी कहे, कान बहरा कर लिए। सबने क्या-क्या नहीं कहा, सहती रही पर करती रही। लड़कियों को सुविधा मिले, तो क्या नहीं कर सकती हैं। लड़कियां अब ओलंपिक से मेडल भी ला रही हैं।’

उन्होंने कहा कि मैं लड़की को कमजोर नहीं रहने देना चाहती। भारत की सारी लड़कियां मेरी अपनी हैं। उम्र चाहे कुछ भी हो, लगन होनी चाहिए।

राजनीति के सवाल पर प्रकाशी तोमर कहती हैं कि इसमें (शूटिंग) नाम हो गया, यह राजनीति ही है। किसकी राजनीति चल रही? जैसे हमारी चल रही है। हमने काफी देर से शूटिंग शुरू की, बच्चों के पास बहुत टाइम होता है। हिम्मत रखो, आगे बढ़ो।

चंद्रो तोमर कहती हैं कि हम चौथी पीढ़ी में आए थे, बच्चों को शिक्षा दो। आमिर खान बोलता है, दादी बुढ़ापे में किसकी लगन लगी? मैंने कहा, ‘तन बुड्ढा होता है, मन बुड्ढा नहीं होता। हिम्मत तो खुद करनी पड़ेगी। हिम्मत होगी तो पार हो ही जाना है।’

SOURCE : JAGRAN

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