घाटे से जूझ रहे सबसे बड़े सरकारी महकमे के निजीकरण से खत्म होंगी ये तीन समस्याएं

भारत की पहली महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश बजट में वैसे तो कई सारे आर्थिक विजन प्रस्तुत किए गए हैं, परंतु इन सबमें भारतीय रेलवे में निजी क्षेत्र के आमंत्रण का जो वर्णन है, वह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी परिघटना है।

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वैसे भारतीय रेल के इतिहास में निजी क्षेत्र की एक बड़ी भूमिका की पहली बार कोई रूप रेखा प्रस्तुत की गई है। रेलवे की मौजूदा स्थिति में इस पहल की जो सबसे महत्वपूर्ण वजह है, वह है भारतीय रेलवे में अगले एक दशक के दौरान करीब 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश की दरकार। यह विशाल निवेश राशि अकेले सरकार के बूते की बात नहीं, बल्कि निजी क्षेत्र को भी इसमें भागीदारी का न्योता दिया गया है।

वैसे कई लोगों को ऐसा लगता है कि निजी क्षेत्र के आने के बाद भारतीय रेलवे, जो विशाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अपना सरीखा परिवहन माध्यम है, वह नहीं रहेगा और महंगा हो जाएगा। दरअसल भारतीय रेलवे को किसी भावुकता भरी नजरों से सरकारी सामाजिक उपक्रम के रूप में देखकर हम इसकी मौजूदा स्थिति को नहीं समझ पाएंगे।

ऐसा नहीं है कि भारतीय रेलवे सरकारी स्वामित्व में चलकर भारत के करोड़ों लोगों को केवल मदद हो, यह उतना ही परेशान भी करता है। इसमें लंबी दूरी की यात्रा हो या कम दूरी की, लोगो को परेशानी का सामना करना ही पड़ता है, भारतीय रेलवे मे लोग बहुत ही बुरे हालात में यात्रा करते हैं।

भारतीय रेलवे की सभी विशिष्टताओं को चलाए रखते हुए तथा इसकी मौजूद अक्षमताओं, कमियों व लीकेज को दूर करने के लिए हमें निजीकरण का एक सक्षम मॉड्यूल बनाना होगा। इस निजीकरण मॉड्यलू की पूरी मैकेनिज्म निर्धारित होने के उपरांत ही इसमें निवेशजनित निजीकरण को अमली जामा पहनाने का काम तय हो पाएगा।


यह बात ध्यान देने वाली है की भारतीय रेलवे का नेटवर्क आजादी के समय करीब 50,000 किलोमीटर था, जो पिछले सात दशकों में बढ़कर सिर्फ़ 65,000 किलोमीटर हो पाया है, और यात्रियों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हो चुकी है।

हमें इस बात को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि भारतीय रेलवे को यात्री टिकट से उसकी पूरी इनकम में केवल एक तिहाई का योगदान ही हो पाता है, जबकि उसके कुल खर्चे का दो तिहाई यात्रियों की आवाजाही पर होता है।

दूसरी तरफ माल परिवहन रेलवे की आमदनी में दो तिहाई का अंशदान करता है, और खर्चे का केवल एक तिहाई उपयोग करता है। समझने की बात है की रेलवे का यात्री गाड़ियों का संचालन पूरी तरह से क्रॉस सब्सिडी के जरिये होता है। रेलवे के पास करीब छह हजार स्टेशन, देश का दूसरा सबसे बड़ा भूमि बैंक, करीब 15 लाख लोगों का कार्यबल, लगभग एक करोड़ लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार देने का गौरव तथा भारत की समूची अर्थव्यवस्था की लाइफ लाइन
होने का श्रेय हासिल है, फिर भी इसका कुल कारोबार महज डेढ़ लाख करोड़ रुपये का ही है। इससे ज्यादा कारोबार तो एक पेट्रोलियम सार्वजनिक उपक्रम कर लेता है, जबकि खुद रेलवे के पास एक दर्जन अपने सार्वजनिक उपक्रम हैं।


हमे यह सच स्वीकारना होगा कि भारतीय रेलवे का अधिकतम मुनाफा टिकट परीक्षक, दलाल, ठेकेदार, भ्रष्ट रेलकर्मी और बड़े अधिकारियों समेत अनेक राजनीतिज्ञों की जेब में जा रहा है। इसीलिए यह सोचने की नौबत आ गई है कि भारतीय रेलवे को एक मामूली मुनाफा कमाने के लिए भी संघर्ष क्यों करना पड़ता है? साफ है कि एकाधिकार की स्थिति चाहे सरकारी स्वामित्व में हो या निजी स्वामित्व में, उसकी अपनी विरूपताएं होती ही हैं।

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पिछले सात दशकों के दौरान रेलवे में बहुस्तरीय संरचनात्मक परिवर्तन का एक व्यापक विजन आया ही नहीं। इसलिए भी आज भारतीय रेलवे में व्यापक बदलाव की जरूरत है, क्योंकि देश के अधिकांश हिस्सों में लोकल ट्रेनों में न तो टिकट चेकिंग होती है और न ही टिकट आसानी से मिल पाते हैं। ऐसे में भारतीय रेलवे का राजस्व मारा जाता है।

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