जलियांवाला बाग नरसंहार के 100 साल, क्या बदला देश में, कहाँ पहुंचे हम

लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर के सत्यपाल और सैफुद्दीन किछलु को अमृतसर से बाहर करने के आदेश और रौलट कानूनों के विरोध में अमृतसर में जगह जगह लोग सड़कों पर उतर आये थे। आक्रोश इतना ज़्यादा था कि जब फिरंगी पुलिसकर्मियों ने विरोध प्रदर्शन को दबाना चाहा तो जवाब में प्रदर्शनकारियों की भीड़ भड़क उठी इस झड़प में करीब 20 भारतीयों को 5 अंग्रेजों की मौत हो गई थी बैंकों में लूटपाट और सार्वजनिक इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया था।

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अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ भारतीयों के इस कृत्य की खबर जब कर्नल रेजीनॉल्ड डायर को हुई तो वह तमतमा उठा। भारतीयों पर अंग्रेज़ी शासन का भय कायम रखने के लिए उसने 13 अप्रैल 1919 की बर्बरतापूर्ण घटना को अंजाम दिया।

13 अप्रैल को सिख समुदाय द्वारा बैसाखी का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्योहार सिख नववर्ष, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1699 में खालसा पंथ का स्थापना दिवस और फसल पकने की खुशी में धूमधाम से मनाया जाता है।

बैसाखी पर भारी तादाद में लोगों के इकट्ठा होने और विद्रोह की आशंका के चलते ओ डायर द्वारा मार्शल लॉ यानी मिलिट्री कानून अमृतसर में लागू कर दिये गए थे और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन या मीटिंग पर रोक लगा दी गई थी।

इसी बीच देशभर से लोग सत्य पाल और सैफुद्दीन के निर्वासन के विरोध में जलियांवाला बाग में एकत्रित हो रहे थे। 13 अप्रैल को बैसाखी का त्योहार होने के कारण पर्यटक और अन्य लोग जिसे जिसे खबर मिलती गई वो भी जलियांवाला बाग़ पहुचते गए। देखते ही देखते सैकड़ों लोग बाग़ में एकत्रित हो गए इस बात की खबर जब कर्नल डायर को हुई तो उसने उस नरसंहार को अंजाम दिया जिसके किस्से आप और हम बचपन से सुनते पढ़ते आये हैं।

13 अप्रैल 1919 वो दिन जब कर्नल डायर ने अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ जलियांवाला बाग़ मे शांतिपूर्ण ढंग से मीटिग कर रहे सैकड़ों लोगों को बिना कोई चेतावनी दिए और बिना किसी विद्रोह के साक्ष्य के मौत के घाट उतार दिया। 10 मिनट तक चली इस अंधाधुंध गोलीबारी में डायर ने आदेश दिया की जबतक गोलियां खत्म न हो जाएं बाग़ के निकासी के जिन रास्तों से लोग भाग रहे हैं वहां पर गोलियां बरसाई जाएं। 
अगले दिन डायर सरकार को दिए अपने बयान में कहता है कि – ” मैने सुना है करीब 200 से 300 लोगों की मृत्यु हुई है, जबकि मेरी पार्टी ने तो 1650 राउंड फायरिंग की थी।”

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हंटर कमीशन ने सरकार द्वारा इस नरसंहार में मारे गए लोगों के सही आंकड़े न जुटा पाने पर सरकार की कड़ी आलोचना की।

सेवा समिति के आंकड़ों के मुताबिक करीब 379 लोगो मारे गए थे और 1100 से अधिक जख्मी हुए। 
हालांकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की एक रिपोर्ट दावा करती है की इस नरसंहार में करीब 1000 लोग मारे गए और 1500 से अधिक जख्मी हुए थे। 
इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।

इस बर्बरतापूर्ण नरसंहार से आहत शहीद सरदार उद्याम सिंह ने लंदन के केकस्टन हाल में भ्रमवश कर्नल डायर की जगह गवर्नर ओ डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। बाद में उधम सिंह को फांसी दे दी गई।

आज 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग़ नरसंहार को 100 साल पूरे हो चुके हैं। मारे गए लोगों के परिवार आज भी दयनीय स्थिति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। नरसंहार के अगले दिन से चली आ रही ब्रिटिश सरकार द्वारा माफी मांगे जाने की मांग आज भी जस की तस है।

हालांकि इस घटना को तत्कालीन लेबर पार्टी के सेक्रेटरी ऑफ वॉर (बाद में प्रधानमंत्री) विंस्टन चर्चिल ने निंदनीय बताया था।
वहीं कुछ दिन पूर्व वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने भी इस नरसंहार पर खेद प्रकट किया लेकिन माफी मांगने से यह कहते हुए मन कर दिया की इससे हमें आर्थिक नुकसान होगा।

मुख्य बात यह है की इस नरसंहार में सिख, हिन्दू, मुस्लिम आदि सभी धर्मों के लोगों की मौत हुई। मौत के पीछे वजह थी अंग्रेज़ी शासन का और उनकी दमनकारी नीतियों का विरोध।

हिन्दू और मुस्लिम एकता के भयावह रूप से साम्राज्यवादी अंग्रेज और सामंतवादी भारतीय एक कतार में खड़े दिखाई दे रहे थे। बांटो और राज करो कि नीति फेल होती दिखाई दे रही थी। 
इसी नरसंहार के बाद 1920-22 का असहयोग आंदोलन हुआ और तमाम छोटे बड़े आंदोलनों और कुर्बानियों के बाद 1947 में देश आज़ाद हुआ।

जब गुलाम थे तो सब हिंदुस्तानी थे
आज आज़ादी ने हिन्दू-मुसलमान बना दिया।

देश में बढ़ती असहिष्णुता और साम्प्रदायिक ताकतों के इरादों को कुचलकर हमे एकता और भाईचारे का पैगाम देना ही होगा। तभी यह देश उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है। यही स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों की अंतिम इच्छा थी।

याद रखें अकेली रस्सी को तोड़ा जा सकता है, काटा जा सकता है, लेकिन एक दूसरे से लिपटी हुई अनेक रस्सियों को तोड़ना या काटना असंभव है।

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