यूपी के मांस कारोबारियों की आवाज़ बने सांसद जावेद अली खान, राज्यसभा में उठाया सवाल

नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश में 2017 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद से मांस कारोबारियों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बुधवार को यूपी से समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान ने उत्तर प्रदेश के मांस व्यापारियों से जुडी समस्याओं का मुद्दा राज्यसभा में उठाया।

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जावेद अली खान ने सदन में कहा कि मानव जाति अपने अस्तित्व के समय से ही मांस का सेवन करती रही है और आज भी देश में 71 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं। मांस की गुणवत्ता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) द्वारा बनाये गए मानकों का सहारा लेकर उत्तरप्रदेश सरकार ने सभी पशुवधशालाओं को बंद करा दिया है। क्योंकि वह एनजीटी द्वारा निर्धारित मानक पूरे नहीं करती हैं। उत्तर प्रदेश में पशु वधशालाएँ नगर पंचायत, नगर पालिका और जिला पंचायतों द्वारा संचालित की जाती हैं।


प्रदेश की भाजपा सरकार को ढाई साल हो चुका है लेकिन अभी तक किसी भी पशुवधशाला का आधुनिकरण एनजीटी के मानकों के अनुसार नहीं किया गया है। पशुवधशालाओं के बंद होने के बाद भी बाजार में मांस उपलब्ध है या तो यह अवैध मांस है या फिर मांस निर्यात करने वाली फैक्टरियों द्वारा मांस की आपूर्ति की जा रही है।

मांस कारोबारियों की समस्याओं की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करते हुए सांसद जावेद अली खान ने कहा की प्रदेश में मांस के कारोबार से जुड़े लोगों का रोज़गार संकट में है, मांसाहारियों के सामने भोजन का संकट है, सींग-हड्डी के कारोबार पर विपरीत असर हुआ है साथ ही चर्म उद्योग पर भी खासा असर देखने को मिला है।

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वक्तव्य के अंत में जावेद अली खान ने प्रधानमंत्री मोदी के स्लोगन “न खाऊंगा न खाने दूंगा” का जिक्र करते हुए सदन के माध्यम से सरकार पर चुटकी लेते हुए कहा कि इस नारे का प्रयोग मांस कारोबारियों पर न किया जाये। जिसपर सभापति वेंकैया नायडू ने टिप्पणी करते हुए कहा की हम भी मांस खाते हैं हमारा क्या होगा, पशुवधशालाओं का आधुनिकरण करके सभी मानकों का पूरा करते हुए पुनः संचालन शुरू कर देना चाहिए।


यहाँ आपको बता दें कि उत्तरप्रदेश में 2017 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद प्रदेश में अवैध बूचड़खानों पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया गया था। जिसके बाद कई मांस कारोबारियों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेशों के बाद भी प्रदेश में बूचड़खानों का नवीनीकरण और आधुनिकरण नहीं किया जा सका है। ऐसी स्थिति में पिछले ढाई साल से लाखों छोटे मांस व्यापारी के सामने रोज़गार संकट का सामना करना पड़ रहा है।

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