अब शाहनवाज हुसैन के सियासी भविष्य पर सवाल

राजग की शनिवार को जारी सूची से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन का नाम नदारद रहने से उनके समर्थकों में निराशा है। शाहनवाज को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से एक हफ्ते में दूसरी दफा धक्का मिला है। पहले तो भागलपुर संसदीय सीट जद (एकी) की झोली में चली गई और दूसरे उन्हें कहीं से टिकट नहीं दिया गया। इससे एक संदेश यह भी जाता है कि पार्टी ने शाहनवाज के पर कतर दिए हैं। इस दफा टिकट न मिलने से समर्थकों का कयास है कि इससे शाहनवाज के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है।

दरअसल भाजपा भागलपुर से अबतक हुए सभी चुनाव लड़ी है। चाहे पुरानी दीपक छाप वाली जनसंघ हो या कमल निशान वाली भाजपा। हार- जीत अपनी जगह है। चुनावी रण में ताल ठोंकने में यह पार्टी कभी पीछे नहीं रही। भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता और पूर्व अध्यक्ष अभय वर्मन कहते हैं कि सीट बंटवारे में जद (एकी) के पास जाने से तकलीफ तो है, मगर गठबंधन धर्म भी निभाना है। कर्ण की भूमि है। पार्टी का निर्देश पालन करना है। मगर शाहनवाज हुसैन के समर्थक प्रमोद वर्मा कहते हैं कि सीमांचल, कोशी, भागलपुर व बांका की सात सीटें भाजपा ने जद (एकी) को दी। एक सीट अररिया अपने खाते में रखी। उम्मीद थी कि शाहनवाज हुसैन को वहां से टिकट मिलेगा, लेकिन सारा जोश ठंडा हो गया। आश्चर्य है कि संसदीय बोर्ड में होते हुए भी वे अपने लिए टिकट जुगाड़ नहीं कर सके। जबकि उन्होंने भागलपुर दौरे में कहा था कि आपको पता होना चाहिए कि मैं केंद्रीय संसदीय बोर्ड का सदस्य हूं। टिकट न मिलने में संशय कहां है?

अररिया संसदीय सीट से भाजपा ने प्रदीप सिंह को उम्मीदवार बनाया है। जबकि वे 2014 और फिर 2018 का उपचुनाव हारे हैं। असल में शाहनवाज हुसैन के सितारे तो 2014 का चुनाव भागलपुर सीट से मोदी लहर के बावजूद हार जाने से गर्दिश में आ गए थे। वे अररिया के बगल की संसदीय सीट किशनगंज से 1999 में चुनाव जीतकर केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। इसके बाद किशनगंज से 2004 का चुनाव हारने के बाद साल 2006 में भागलपुर संसदीय सीट पर उप चुनाव ने फिर से इनका भाग्य का दरवाजा खोला। वे 2014 तक भागलपुर के सांसद रहे। यह सीट सुशील कुमार मोदी के इस्तीफे से खाली हुई थी। तब सुशील बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी राजग की सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाए गए थे।

2014 में भागलपुर से हार गए तब से वे असहज थे। भले ही केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता और केंद्रीय चुनाव समिति का सदस्य बनाए रखा मगर 2014 की हार के बाद से ही शाहनवाज चिंतित नजर आ रहे थे। अब टिकट न मिलने से अपने राजनीतिक भविष्य की ही चिंता खड़ी हो गई है।

SOURCE : JANSATTA

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