24 अप्रैल को ही क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस (National Panchayati Raj Day)?

Panchayati Raj: भारत में स्थानीय स्वशासन की अवधारणा प्राचीन काल से मौजूद है। भारत में पंचायती राज Panchayati Raj) पद से अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वशासन प्राणाली से है। सभी राज्यों की संबद्ध राज्य विधायिका द्वारा इसका सृजन किया जाता हैं ताकि आधारभूत स्तर पर लोकतंत्र को स्थापित किया जा सके। और सत्‍ता का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण हो सके।

जैसा कि हम सब जानते हैं, महात्मा गांधी ने भी पंचायतों और ग्राम गणराज्यों की वकालत की थी। स्वतंत्रता के बाद से, समय– समय पर भारत में पंचायतों के कई प्रावधान किए गए।


बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिश पर ‘पंचायती राज’ (Panchayati Raj) का शुभारम्भ स्वतंत्र भारत में 2 अक्‍टूबर, 1959 ई को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के द्वारा राजस्‍थान के नागौर जिले में किया गया। तथा 11 अक्‍टूबर, 1959 को नेहरू जी ने आन्‍ध्रप्रदेश राज्‍य में पंचायतीराज का प्रारंम्‍भ किया।

Also read: Article 360: क्या होता है वित्तीय आपातकाल ? (तीनो प्रकार के आपातकाल 352, 356, 360 का संछिप्त परिचय)

73 वें संविधान संशोधन 1992 द्वारा इसे संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया और इसी संशोधन के माध्‍यम से देश में ‘पंचायती राज’ (Panchayati Raj) की व्यवस्था लागू की गई। इसे संविधान के अनुच्छेद 40 (नीति निर्देशक तत्व, जिसमें पंचायती राज स्थपित करने का लक्ष्य वर्णित है) के तहत स्वरूप प्रदान किया गया है।

वर्तमान में हमारे देश में 2.62 लाख पंचायतें हैं, जिनमें 2.55 लाख ग्राम पंचायतें, 6775 ब्लॉक पंचायतें और 654 जिला पंचायतें शामिल हैं।


बलवंत राय मेहता समिति :

बलवंत राय मेहता समिति का गठन पंचायती राज व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए वर्ष 1956 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में किया गया था। इस समिति ने भारतीय लोकतंत्र की सफलता के लिए लोकतंत्र की इमारत को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1957 में प्रस्तुत कर दी थी।

समिति की सिफारिशों को 1 अप्रैल, 1958 को लागू किया गया। पंचायती राज व्यवस्था  को मेहता समिति ने “लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण” का नाम दिया।

समिति ने ग्रामीण स्थानीय शासन के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था का सुझाव दिया।

Also read: क्या है तबलीगी जमात (Tablighi Jamaat)? इतिहास, स्थापना और कार्य पद्धति?

बलवंत राय मेहता समिति द्वारा दिए गए सुझाव :

  • सरकार को अपने कुछ कार्यों और उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाना चाहिए और उन्हें एक ऐसी संस्था को सौंप देना चाहिए, जिसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत विकास के सभी कार्यों की पूरी जिम्मेदारी रहे। सरकार का काम सिर्फ इतना रहे कि ये इन संस्थाओं का पथ-प्रदर्शन और निरीक्षण करती रहे।
  • लोकतंत्र की आधारशिला को मजबूत बनाने के लिए राज्यों की उच्चतर इकाइयों (जैसे प्रखंड, जिला) से ग्राम पंचायतों का अटूट सम्बन्ध हो। इसलिए, प्रखंड और जिले में भी पंचायती व्यवस्था को अपनाना आवश्यक है
  • त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली की स्थापना करना, जिसमें ग्रामीण स्तर पर ग्राम-पंचायत, प्रखंड या ब्लॉक स्तर पर पंचायत-समिति, इस पंचायत समिति का संगठन ग्राम पंचायतों द्वारा हो तथा जिला स्तर पर जिला परिषद्, इस जिला परिषद् का संगठन पंचायत समितियों द्वारा हो।
  • ग्राम पंचायत का गठन प्रत्यक्षतः निर्वाचित प्रतिनिधियों से किया जाना चाहिए, जबकि पंचायत समितिजिला परिषद् का गठन अप्रत्यक्षतः निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
  • जिला कलक्टर को जिला परिषद् का अध्यक्ष होना चाहिए।
  • उपरोक्त सुझावों को राष्ट्रीय विकास परिषद द्वारा 1958 में स्वीकार कर लिया गया।

पंचायती राज व्‍यवस्‍था का संविधानिकीकरण :

  • पंचायती राज (Panchayati Raj) संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए नरसिम्हा राव सरकार ने सितंबर, 1991 में लोकसभा में एक संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया।
  • यह लोकसभा द्वारा 22 दिसंबर, 1992 को तथा राज्या सभा द्वारा 23 दिसंबर, 1992 को पारित कर दिया गया। बाद में इसे 17 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा भी अनुमोदित कर दिया गया
  • 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद 24 अप्रैल, 1993 (24 April) को इसे पंचायती राज कानून के रूप में पूरे भारत वर्ष में लागू कर दिया गया।
  • इसी कारण आज भारत में प्रतिवर्ष 24 अप्रैल (24 April) को पंचायती राज दिवस (Panchayati Raj Day) के रूप में मनाया जाता है।

73 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 :

  • इस विधेयक में भारतीय संविधान का भाग 9 निहित है।
  • इसे पंचायते शीर्षक दिया गया है। और इस अधिनियम में अनुच्छेद 243 से 243-(ण) तक के प्रावधान शामिल है।
  • इस अधिनियम के द्वारा संविधान में 11 वीं अनुसूची जोड़ी गयी है।
  • इसमें पंचायतों की कार्यपद्धति से संबंधित 29 विषय शामिल है तथा अनुच्छेद 243-(छ) में इन विषयों का उल्लेख है।
  • राज्य सरकारों का यह दायित्व है कि वे इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नई पंचायती राज प्रणाली को अपनाएँ।
  • इस अधिनियम द्वारा प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र  (Reprensentative Democracy) को सहभागी लोकतंत्र (Participatory Democracy) में परिवर्तित कर दिया गया है।
  • अधिनियम में पंचायती राज प्रणाली के आधार के रूप में ग्राम सभा का प्रावधान है।
  • यह निकाय ग्रामीण स्तर पर पंचायती क्षेत्र में किसी ग्राम की निर्वाचन सूची में पंजीकृत सभी वयस्कों से मिलकर बनता है।
  • यह एक प्रकार से ग्राम परिषद् है, जो पंचायत के क्षेत्र के सभी पंजीकृत मतदाताओं से मिलकर गठित होता है।
  • यह ग्राम स्तर पर उन्हीं शक्तियों का प्रयोग तथा दायित्वों का निर्वाह करती है, जो राज्य विधायिका निर्धारित करती है।
  • एक राज्य में मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन बीस लाख से अधिक की आबादी वाले स्थान पर नहीं किया जा सकता।

पंचायती राज (Panchayati Raj) की त्रि-स्‍तरीय प्रणाली (Three-Tier System):

अधिनियम का उद्देश्य पंचायती राज (Panchayati Raj) की तीन– स्तरीय व्यवस्था प्रदान करना है, इसमें शामिल हैं–

  • ग्राम स्‍तर पर– ग्राम पंचायत या ग्राम सभा
  • प्रखंड (ब्लॉक) स्‍तर पर– पंचायत समिति
  • जिला स्‍तर पर– जिला परिषद

क) ग्राम पंचायत या ग्राम सभा की संरचना :

ग्राम पंचायत की न्यायपालिका को ग्राम कचहरी कहते हैं जिसका प्रधान सरपंच होता है सरपंच का निर्वाचन मुखिया की तरह ही प्रत्यक्ष रूप से होता है। सरपंच का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, उसे कदाचार, अक्षमता या कर्तव्यहीनता के कारण सरकार द्वारा हटाया भी जा सकता है। अगर 2/3 पंच सरपंच के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर दें तो सरकार सरपंच को हटा सकती है। सरपंच का प्रमुख कार्य ग्राम कचहरी का सभापतित्व करना है। कचहरी के प्रत्येक तरह के मुक़दमे की सुनवाई में सरपंच अवश्य रहता है। सरपंच ही मुक़दमे को स्वीकार करता है तथा मुक़दमे के दोनों पक्षों और गवाहों को उपस्थित करने का प्रबंध करता है। वह प्रत्येक मुकदमे की सुनवाई के लिए दो पंचों को मनोनीत करता है।

ग्राम पंचायत के कार्य :

  • सड़के व नालियों को बनवाना।
  • पेयजल की व्यवस्था करना।
  • प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा का प्रबंधन करना।
  • चिकित्सा एवं स्वास्थ्य की रक्षा की व्यवस्था।
  • सार्वजनिक स्थानों की व्यवस्था करना।
  • महिला एवं बाल कल्याण से जुड़े कार्यों का प्रबंधन।
  • लोक व्यवस्था में सरकार को सहायता प्रदान करना।
  • कृषि एवं भूमिका विकास।
  • ग्रामीण विकास के कार्यों को सहयोग प्रदान करना।

ख) पंचायत समिति की संरचना :

पंचायत समिति के अंतर्गत प्रत्येक ग्राम पंचायत का मुखिया पंचायत समिति का सदस्य होगा। प्रखंड की प्रत्येक पंचायत के सदस्यों द्वारा निर्वाचित दो सदस्य होंगे। प्रखंड के अंतर्गत चुनाव क्षेत्रों द्वारा निर्वाचित राज्य विधान सभा और संघीय लोक सभा के सभी सदस्य होंगे। विधान परिषद् और संघीय राज्य सभा के वे सभी सदस्य, जो उस प्रखंड के निवासी हों।

वही व्यक्ति पंचायत समिति का सदस्य हो सकेगा, जो —

  • भारत का नागरिक हो
  • 25 वर्ष की आयु का हो
  • सरकार के अन्दर किसी लाभ के पद पर न हो।

प्रमुख और उपप्रमुख :

प्रत्येक पंचायत समिति में एक प्रमुख और एक उपप्रमुख होगा, जिनका निर्वाचन पंचायत समिति के सदस्य करेंगे, लेकिन कोई सह-सदस्य इन पदों के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकता। प्रमुख पंचायत समिति का अध्यक्ष होता है।  उसका कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है। पंचायत समिति अविश्वास का प्रस्ताव (No-confidence motion) पास करके और राज्य सरकार आदेश जारी करके प्रमुख और उपप्रमुख को हटा सकती है।


पंचायत समिति के कार्य :

पंचायत समिति को अपने क्षेत्र के अंतर्गत सभी विकास-कार्यों के सम्पादन का अधिकार दिया गया  है। ग्राम पंचायतों, सहकारी समितियों आदि की मदद से पंचायत समिति ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए कोई भी आवश्यक कार्य कर सकती है। पंचायत समिति के कार्य निम्न प्रकार के होते हैं

  • शिक्षा-सम्बन्धी कार्य
  • स्वास्थ्य-सम्बन्धी कार्य
  • ग्रामोद्योग-सम्बन्धी कार्य
  • कृषि-सम्बन्धी कार्य

ग) जिला परिषद की संरचना :

प्रत्येक जिला में एक जिला परिषद् की स्थापना होगी। जिला परिषद् के निम्नलिखित सदस्य होंगे –

  • जिले  की सभी पंचायत समितियों के प्रमुख
  • क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे निर्वाचित सदस्य। निर्वाचित सदस्यों की संख्या जिलाधिकारी द्वारा निश्चित की जाएगी। प्रत्येक क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र से एक सदस्य निर्वाचित किया जाएगा।
  • राज्य सभा और राज्य विधान परिषद् के वैसे सदस्य जो जिले के अंतर्गत निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हो।
  • लोक सभा और राज्य विधान सभा के वैसे सदस्य जो जिले के किसी भाग या पूरे जिले का प्रतिनिधित्व करते हों और जिनका निर्वाचन क्षेत्र जिले के अंतर्गत पड़ता हो।

अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष 

जिला परिषद् के निर्वाचित सदस्य यथाशीघ्र अपने में से दो सदस्यों को क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में निर्वाचित करेंगे। जिला परिषद् की बैठक बुलाने, उसकी अध्यक्षता करने एवं उसका संचालन करने का अधिकार अध्यक्ष का ही होगा। इसके अतिरिक्त जिला परिषद् के सभी पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों पर पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण रखना, जिला परिषद् की कार्यपालिका एवं प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण रखना, जिले में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को राहत दिलाना इत्यादि उसके मुख्य कार्य हैं।

अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष ही जिला परिषद् की बैठक की अध्यक्षता करता है। अध्यक्ष की अनुपस्थिति में अथवा एक महीने से अधिक की अवधि के लिए अवकाश पर रहने की स्थिति में अध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग और कर्त्तव्यों का निर्वहन वही करता है।


जिला परिषद् के कार्य

  • कृषि-सबंधी।
  • पशुपालन-सबंधी।
  • उद्योग-धंधे-सबंधी।
  • स्वास्थ्य-सम्बन्धी।
  • शिक्षा-सम्बन्धी।
  • सामजिक कल्याण एवं सुधार सम्बन्धी।
  • आवास-सम्बन्धी।
  • अन्य कार्य- ग्रामीण बिजलीकरण, वृक्षारोपण, ग्रामीण सड़कों का निर्माण, ग्रामीण हाटों और बाजारों का अधिग्रहण, वार्षिक बजट बनाना इत्यादि।

पंचायतों का कार्यकाल :

अधिनियम में हर स्तर पर पंचायतों के लिए 5 वर्ष का कार्यकाल निर्धारित किया गया है। किंतु, इन्हें समय से पूर्व भी विघटित किया जा सकता है। विघटन के मामले में, विघटन की तिथि से 6 माह के भीतर नया चुनाव करा लेना आवश्‍यक होगा।

सीटों का आरक्षण :

  • इस अधिनियम में पंचायतों के प्रत्येक स्तर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पंचायती क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है।
  • राज्य विधायिका को यह अधिकार है कि वह ग्राम या किसी स्तर पर अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति हेतु प्रधान(अध्यक्ष) के पद के लिए आरक्षण संबंधी उपबंध करे।
  • अधिनियम में कुल सीटों की संख्या के कम-से-कम 1/3 पर महिलाओं के लिए (जिसमें अनुसूचि जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं) आरक्षण का प्रावधान है।
  • पंचायतों के प्रत्येक स्तर पर अध्यक्ष के पद की कुल संख्या का कम-से-कम 1/3 महिलाओं के लिए आरक्षित है।

सदस्यों व अध्यक्ष का चुनाव :

  • पंचायत के तीनों स्तरों के सभी सदस्यों का चयन जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति से किया जाता है।
  • मध्यवर्ती तथा जिला स्तरों पर अध्यक्ष का चयन इस स्तर के लिए चयनित सदस्यों में से ही अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा किया जाता है।
  • किसी पंचायत के ग्राम स्तर पर अध्यक्ष का चयन उस विधि के किया जाएगा, जो राज्य विधायिका निर्धारित करे यानि यह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है।

राज्‍य चुनाव आयोग :

पंचायतों के सभी चुनावों के लिए मतदाता सुची का निर्माण तथा चुनाव कराने संबंधी सभी नियंत्रणात्मक, निर्देशात्मक तथा पर्यवेक्षणात्मक शाक्तियाँ राज्य चुनाव आयोग को सौंपी जानी चाहिए।

यह आयोग एक राज्य चुनाव आयुक्त के द्वारा गठित होता है जिसकी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।

कर लगाने और वित्तीय संसाधनों का अधिकार :

एक राज्य, कानून द्वारा, पंचायत को कर लगाने और उचित करो, चुंगियों, सड़क कर तथा शुल्कों को जमा करने का अधिकार प्रदान कर सकता है। यह राज्य सरकार द्वारा एकत्र किए गए विभिन्न शुल्कों, करों आदि को पंचायत को आवंटित भी कर सकता है। राज्य की संचित निधि से पंचायतों को अनुदान सहायता दी जा सकती है।

The Ace EXPRESS से जुड़ने और लगातार अपडेटेड रहने के लिए हमें Facebook पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे

Facebook Comments