Article 360: क्या होता है वित्तीय आपातकाल ? (तीनो प्रकार के आपातकाल 352, 356, 360 का संछिप्त परिचय)

वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) का सम्पूर्ण विवरण, यह क्या होता है, किसके द्वारा लगाया जाता है, संसद से इसका अनुमोदन, इसकी अवधि और इसके परिणाम।

भारतीय संविधान(Constitution of India) के निर्माताओं ने देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा यदि खतरे में हो तो केंद्र सरकार बिना किसी रोक-टोक के गंभीर फैसले ले सके इसी को ध्यान में रखकर संविधान में कुछ प्रावधान किये गए जिसे हम आपातकाल (Emergency) के नाम से जानते है।


भारत के संविधान में तीन तरह के आपातकाल की व्यवस्था की गयी है।

  1. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)
  2. राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356)
  3. वित्तीय या आर्थिक आपातकाल (अनुच्छेद 360) (Article 360)

आज हम राष्ट्रीय आपातकाल राष्ट्रपति शासन को संक्षेप में तथा वित्‍तीय आपातकाल को विस्‍तार से समझेगें

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राष्ट्रीय आपातकाल(अनुच्छेद 352):

  • राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह में से किसी भी आधार पर राष्ट्रपति संघ के मंत्रिमंडल की लिखित सलाह के बाद अनु0 352 तहत कर सकते है।
  • राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा को न्यायालय में प्रशनगत किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राज्य सरकार निलंबित नहीं की जाती, अपितु वह केंद्र की कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती है।
  • सशस्त्र विद्रोह के आधार पर लगाए गए आपात को आंतरिक आपातकाल के नाम से तथा यु़द्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर लगाए गए आपात को बाह्य आपातकाल के नाम से जाना जाता है।
  • राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल को किसी समय हटाया जा सकता है। लोक सभा आपातकाल को समाप्त करने के लिए साधारण बहुमत द्वारा संकल्प पारित कर हटा सकती है।
  • पहले राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा युद्ध, बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के आधार पर की जाती थी, लेकिन 44वे संविधान संशोधन 1978 द्वारा आंतरिक अशांति की जगह सशस्त्र विद्रोह का प्रावधान किया गया।
  • राष्ट्रीय आपातकाल संसद द्वारा एक अनुमोदन के बाद केवल छः माह तक प्रवर्तन में रह सकता है।
  • अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 राष्ट्रीय आपातकाल की किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं हो सकता, लेकिन अनुच्छेद 19 बाह्य आपात की दशा में स्वतः निलंबित हो जाता है।
  • अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीयआपातकाल की प्रथम घोषणा चीनी आक्रमण के समय 26 अक्टूबर, 1962 ई. को की गयी थी। (बाह्य आक्रमण के आधार पर)
  • दुसरी बार भी राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा बाह्य आक्रमण के आधार पर पाकिस्तान से युद्ध के समय 3 दिसंबर, 1971 ई. को की गयी।
  • तीसरी या अंतिम बार राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा जून 1975 से मार्च 1977 तक आंतरिक अशांति के आधार पर की गयी थी।

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राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356):

  • राज्यपाल की रिपोर्ट पर या राष्ट्रपति को अगर यह लगता है कि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है अथवा संघ की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ रहता है, तो राष्ट्रपति राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते है।
  • राष्ट्रपति शासन के दौरान संघ न्यायिक कार्य को छोड़ राज्य प्रशासन के कार्य अपने हाथ में ले लेता है।
  • राज्य में राष्ट्रपति शासन की अवधि दो माह होती है। इससे अधिक के लिए संसद से अनुमति लेनी होती है तब यह 6 माह की हो जाती है। अधिकतम तीन वर्ष तक यह एक राज्य में प्रवर्तन में रह सकती है। इससे अधिक के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता है।
  • सर्वप्रथम अनुच्छेद 356 के तहत पंजाब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
  • सर्वाधिक अवधि के लिए भी पंजाब राज्य में ही राष्ट्रपति शासन लगा रहा।

वित्तीय या आर्थिक आपातकाल (अनुच्छेद 360) (Article 360):

  • यदि राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि ऐसी स्थिति विद्यमान है, जिसके कारण भारत के वित्तिय स्थायित्व या साख को खतरा है तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 360 (Article 360) के तहत वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) की घोषणा कर सकते है।
  • वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) (Article 360) की घोषणा को दो माह के भीतर संसद के दोनो सदनों के सम्मुख रखना तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है। स्वीकृति होने के बाद यह तब तक जारी रहेगा जब तक राष्ट्रपति इसे वापस नहीं लेते।
  • यदि वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) (Article 360) की घोषणा उस समय की जाती है, जब लोक सभा विघटित हो, तो दो माह के भीतर राज्य सभा की स्वीकृति मिलने के बाद वह आगे भी लागू रहेगी, किंतु नवनिर्वाचित लोक सभा द्वारा उसकी प्रथम बैठक के आरम्भ से 30 दिन के भीतर ऐसी घोषणा की स्वीकृति आवश्यक है।
  • वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) की घोषणा को राष्ट्रपति द्वारा किसी भी समय वापस लिया जा सकता है।
  • भारत में वित्‍तीय आपातकाल(Financial Emergency) की घोषणा एक बार भी नहीं की गयी हैा

वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) के प्रभाव:

  • उच्चतम न्यायालय(Supreme Court), उच्च न्यायालय(High Court) के न्यायाधीशों तथा संघ एवं राज्य सरकारों के अधिकारियों के वेतन में कमी की जा सकती है।
  • राष्ट्रपति आर्थिक दृष्टि से किसी भी राज्य सरकार को निर्देश दे सकता है।
  • राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वह राज्य सरकारों को यह निर्देश दे कि राज्य के समस्त वित्त विधेयक उसकी स्वीकृति से विधानसभा में प्रस्तुत किए जाएँ।
  • राष्ट्रपति केंद्र  तथा राज्यों में धन संबंधी विभाजन के प्रावधानों में आवश्यक संशोधन कर सकते हैं।
  • राज्यों के राज्यपालों को यह निर्देश दिया जा सकता है कि वे राज्य के सभी धन एवं वित्त विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित करें।
  • राज्यों को वित्तीय अनुशासन कायम करने के लिए कहा जा सकता है।
  • सभी संवैधानिक अधिकारियों के वेतन एवं भत्ते कम किए जा सकते हैं।
  • देश में आर्थिक आपातकाल लागू होते ही आम नागरिकों के पैसों और संपत्ति पर देश का अधिकार हो जाता हैा
  • सरकार बैंक तथा आरबीआई को कह कर ब्याज या फिर रेपो रेट बढ़ा भी सकती हैं।

वर्तमान में चर्चा में क्यों?

हाल ही में सरकार ने सांसदों और मंत्रियो के 30 प्रतिशत वेतन में की कटौती:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल और मंत्रिपरिषद की बैठक में सरकार ने कोरोना से लड़ने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है, जिसमें प्रधानमंत्री समेत सभी कैबिनेट मंत्रियों और सांसदों की सैलरी में 30 फीसदी की कटौती करने का फैसला लिया है और यह कटौती एक साल तक रहेगी।

कैबिनेट फैसले की जानकारी देते हुए प्रकाश जावड़ेकर ने बताया, कि सांसदों के वेतन में 30 फीसदी की कटौती के संदर्भ में अध्यादेश को मंजूरी दे दी गयी है। 1 अप्रैल, 2020 से एक साल के लिए सांसदों को मिलने वाला वेतन 30 फीसदी  तक कम किया जाएगा। उन्होंने बताया कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपालों ने स्वेच्छा से सामाजिक ज़िम्मेदारी  के रूप में और कोरोना वायरस संकट के मद्देनजर वेतन कटौती का फैसला किया है। यह धनराशि भारत के समेकित कोष(CFI- Consolidated Fund of India) में जाएगी।

प्रकाश जावड़ेकर ने यह भी बताया कि कैबिनेट ने भारत में कोविड-19 के प्रतिकूल प्रभाव के प्रबंधन के लिए 2020-21 और 2021-22 के लिए सांसदों को मिलने वाले संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLAD फंड) को अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया है। 2 साल के लिए MPLAD फंड के 7900 करोड़ रुपए का उपयोग भारत की संचित निधि में किया जाएगा।


थोड़ा इसे भी जानें।

क्‍या है ‘संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ (Members of Parliament Local Area Development Scheme – MPLADS):

  • संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) की शुरुआत 23 दिसंबर, 1993 को हुई थी।
  • इस योजना के द्वारा संसद सदस्य अपने संसदीय क्षेत्रों में स्थानीय ज़रूरतों के आधार पर विकास कार्यों को शुरू करने के लिये सुझाव दे सकते हैं। 
  • MPLADS पूर्ण रूप से भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित योजना है। इस योजना के तहत एक संसदीय क्षेत्र में अधिकतम 5 करोड रूपये की राशि वार्षिक रूप में दी जाती है।
  • इस योजना की तहत देश में राष्ट्रीय प्राथमिकता जैसे- पेयजल, सड़क, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता आदि के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किये गए हैं।

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